उन्मुक्त हो
उन्मुक्त हो...
उन्मुक्त हो, स्वच्छंद हो,
मेरे "प्रेम" की अनुबंध तू।
हो मेरी अनुरागिनी,
मेरी कविताओं की छंद तू।
हो प्यार की पुष्पांजलि,
हर हार की है 'द्वंद' तू।
पतझर की हरियालीयां,
मेरे जीवन की है रंग तू।
कुमुदिनी हो, तुम कामिनी हो,
हो कामलता की सुगंध तू।
मधुर, प्रीत की उपवन हो,
मेरी सांसो का उपबंध तू।
सरस्वती, गंगा की धारा हो,
बहती यमुना सा स्वतंत्र तू।
कृष्णा की हो बांसुरी,
मेरे आत्मा की सत्संग तू।
जगत आदी की शक्ति हो,
हो मीरा की मृदंग तू।
अंत तू ही, तुम उद्गम हो,
इस "श्रृष्टि" का आनंद तू।
-के के राजीव
उन्मुक्त हो, स्वच्छंद हो,
मेरे "प्रेम" की अनुबंध तू।
हो मेरी अनुरागिनी,
मेरी कविताओं की छंद तू।
हो प्यार की पुष्पांजलि,
हर हार की है 'द्वंद' तू।
पतझर की हरियालीयां,
मेरे जीवन की है रंग तू।
कुमुदिनी हो, तुम कामिनी हो,
हो कामलता की सुगंध तू।
मधुर, प्रीत की उपवन हो,
मेरी सांसो का उपबंध तू।
सरस्वती, गंगा की धारा हो,
बहती यमुना सा स्वतंत्र तू।
कृष्णा की हो बांसुरी,
मेरे आत्मा की सत्संग तू।
जगत आदी की शक्ति हो,
हो मीरा की मृदंग तू।
अंत तू ही, तुम उद्गम हो,
इस "श्रृष्टि" का आनंद तू।
-के के राजीव
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