प्रेम रंग की होली

प्रेम रंग की होली...

पत्ते बिखर-बिखर सी गई है,
टूट-टूट     कर   डाली   से।
अनबन   जैसे   हो   गई  हो,
बसंत   की   हरियाली    से।

अंग-अंग   अब  टूट  रही है,
झुम     रही       पूर्वाइ    से।
कुम्हला गई है यौवन गुलों के
पछुवा    की    अंगड़ाई   से।

कलियाँ भी शरमा  रही अब,
देख   भवरे   की   टोली  से।
झुम कर  पीने  चलें  हों जैसे
फाग  के मय  की प्याली से।

तन मन पुलकित हो उठता है,
रंगों       और     रंगोली   से।
बरस  रही  आनंद,  प्रेम  संग,
ब्रज  के ऑगन की होली  से।

आनंदित हो  उठा है  "श्रृष्टि"
इनकी  मधुर   ठिठोली    से।
देख    राधिका    झुम    रही,  
कान्हा की आंख मिचौली से।

             -के. के. राजीव 

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