प्रेम ही सर्वोपरि है (भाग-1)
प्रेम ही सर्वोपरि है
...क्योंकि प्रेम चित्त की एक दशा है, यही एक मात्र वो अनुभूति है, जो संसार के समस्त प्राणियों के लिए आपके कोमल भावनाओं द्वारा प्रदर्शित होता है!
प्रेम का अर्थ है किसी के लिए आपके
अंदर की सच्चाई और स्वच्छ भावनाएं, क्योंकि जहाँ सत्य है वहीं प्रेम है अर्थात सत्य ही प्रेम है...
राजीव अर्थात "कमल" जिसके पंखुरीयों पर अनगिनत, अनंत शूल विराजते है परंतु वे अपनी बाहरी संरचना के खिलाफ़ सौंदर्य के साथ-साथ स्वच्छंद भाव से लोगों के जीवन में खुशबू लुटाता है और संभवतः इसी में इसके जीवन की सार्थकता भी निहित है।
इतना ही नहीं अगर कोई श्यामल भूखा दिखे तो उसे भी गोद में लेकर अपनी पंखुरीयों से डक कर मीठा पान कराता परंतु वही "राजीव" आज दुखी है, हताश है, नाराज है, उदास है और आखिर हो भी क्यों नहीं...
जब दूनिया पर अपनी भावनात्मक जीत दर्ज कराने वाले "जगजीत" अपने आप से हार जाए, अपनी भावनाओं से हार जाय, अपने कर्तव्यों से हार जाए या फिर अपने किस्मत से हार जाए तो अधूरेपन की अनुभूति तो स्वभाविक है...
आज एक बार फिर "राजीव" जो एक मात्र नाम ही नही एक "विचार" है, एक "भावनाएँ" हैं, जो एक नई सोच है आज एक बार पुनः अपने ही भाग्य के हाथों पराजित हुए हैं।
अब आप कहेंगे कैसे? तो आईए हम मिलवाते है आपको एक ऐसे व्यक्तित्व से अर्थात "राजीव" से जिसके नजर में "प्रेम" ही सर्वोपरि है...
***
वास्तव में आज मैं दुखी हूँ, निराश हूँ, हताश हूँ, ऑंखें भी नम है और हो भी क्यों नहीं? जब आप प्राण से भी ज्यादा किसी को "प्रेम" करते है, तो वही आपके जीवन का आधार बन जाता है।
ऐसे में हमारे दरम्यान जब कोई भी अवरोध जन्म लेता है तो असहनीय पीड़ा होती है, मैं भी पीड़ा में हूँ और मेरी पीड़ा केवल "वही" समझ सकती है, जिससे मैं कह रहा हूँ...
काल चक्र से मैं आहत अवश्य हुआ हूँ परंतु मैं हार को स्वीकार नहीं करता क्योंकि किसी के यादों के ताप में जलने का भी एक अपना आनंद है और मैं भी उस आनंद से वंचित नहीं रहना चाहता....और तो और "सोना तप कर ही तो कुंदन कहलाता है..."
इस विश्वास के साथ की मेरा "प्रेम" भी इस ताप में तप कर कुंदन अवश्य कहलाएगा... आप भी सोच रहे होंगे की ये मैं कैसी बातें कर रहा हूँ, तो क्या?
आप जलते हुए दीपक को कभी देखे है अगर नही तो आने वाले दीपावली में अवश्य देखियेगा... तभी आप जलने के आनंद की अनुभूति से अवगत हो पाएंगे क्योंकि दीपक के तेज लौ में अनगिनत कीट-पतंग जल कर राख हो जाते है।
आग में कूदने का परिणाम वो जानते है परंतु जलने के आनंद की अनुभूति सिर्फ वही महसूस कर सकता है...
मैं भी तपना चाहता हूँ, जलना चाहता हूँ और इस ताप के अनुभूति से प्रेम के पराकाष्ठा को छूना चाहता हूँ और अगर मेरा प्रेम शाश्वत है तो मेरी हार में भी मेरी जीत निहित है।
-के के राजीव
...क्योंकि प्रेम चित्त की एक दशा है, यही एक मात्र वो अनुभूति है, जो संसार के समस्त प्राणियों के लिए आपके कोमल भावनाओं द्वारा प्रदर्शित होता है!
प्रेम का अर्थ है किसी के लिए आपके
अंदर की सच्चाई और स्वच्छ भावनाएं, क्योंकि जहाँ सत्य है वहीं प्रेम है अर्थात सत्य ही प्रेम है...
राजीव अर्थात "कमल" जिसके पंखुरीयों पर अनगिनत, अनंत शूल विराजते है परंतु वे अपनी बाहरी संरचना के खिलाफ़ सौंदर्य के साथ-साथ स्वच्छंद भाव से लोगों के जीवन में खुशबू लुटाता है और संभवतः इसी में इसके जीवन की सार्थकता भी निहित है।
इतना ही नहीं अगर कोई श्यामल भूखा दिखे तो उसे भी गोद में लेकर अपनी पंखुरीयों से डक कर मीठा पान कराता परंतु वही "राजीव" आज दुखी है, हताश है, नाराज है, उदास है और आखिर हो भी क्यों नहीं...
जब दूनिया पर अपनी भावनात्मक जीत दर्ज कराने वाले "जगजीत" अपने आप से हार जाए, अपनी भावनाओं से हार जाय, अपने कर्तव्यों से हार जाए या फिर अपने किस्मत से हार जाए तो अधूरेपन की अनुभूति तो स्वभाविक है...
आज एक बार फिर "राजीव" जो एक मात्र नाम ही नही एक "विचार" है, एक "भावनाएँ" हैं, जो एक नई सोच है आज एक बार पुनः अपने ही भाग्य के हाथों पराजित हुए हैं।
अब आप कहेंगे कैसे? तो आईए हम मिलवाते है आपको एक ऐसे व्यक्तित्व से अर्थात "राजीव" से जिसके नजर में "प्रेम" ही सर्वोपरि है...
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वास्तव में आज मैं दुखी हूँ, निराश हूँ, हताश हूँ, ऑंखें भी नम है और हो भी क्यों नहीं? जब आप प्राण से भी ज्यादा किसी को "प्रेम" करते है, तो वही आपके जीवन का आधार बन जाता है।
ऐसे में हमारे दरम्यान जब कोई भी अवरोध जन्म लेता है तो असहनीय पीड़ा होती है, मैं भी पीड़ा में हूँ और मेरी पीड़ा केवल "वही" समझ सकती है, जिससे मैं कह रहा हूँ...
काल चक्र से मैं आहत अवश्य हुआ हूँ परंतु मैं हार को स्वीकार नहीं करता क्योंकि किसी के यादों के ताप में जलने का भी एक अपना आनंद है और मैं भी उस आनंद से वंचित नहीं रहना चाहता....और तो और "सोना तप कर ही तो कुंदन कहलाता है..."
इस विश्वास के साथ की मेरा "प्रेम" भी इस ताप में तप कर कुंदन अवश्य कहलाएगा... आप भी सोच रहे होंगे की ये मैं कैसी बातें कर रहा हूँ, तो क्या?
आप जलते हुए दीपक को कभी देखे है अगर नही तो आने वाले दीपावली में अवश्य देखियेगा... तभी आप जलने के आनंद की अनुभूति से अवगत हो पाएंगे क्योंकि दीपक के तेज लौ में अनगिनत कीट-पतंग जल कर राख हो जाते है।
आग में कूदने का परिणाम वो जानते है परंतु जलने के आनंद की अनुभूति सिर्फ वही महसूस कर सकता है...
मैं भी तपना चाहता हूँ, जलना चाहता हूँ और इस ताप के अनुभूति से प्रेम के पराकाष्ठा को छूना चाहता हूँ और अगर मेरा प्रेम शाश्वत है तो मेरी हार में भी मेरी जीत निहित है।
-के के राजीव
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